Ek kullad coffee aur kuchh lamhe zindagi ke.

एक कुल्लड़ कॉफ़ी,
एक कलम हाथ में लिये,
सोच रहा हूँ ज़िन्दगी के कुछ लम्हो के बारे में।
एक सुबह बो भी थी जब समय थमा हुआ सा लगता था।
एक शाम वो भी थी जब सिर्फ अंधेरे का ही इंतेज़ार रहता था।
एक रात वो भी थी जब अँधेरे से प्यार सा हो गया था।

वो अंधेरे से लिपट कर सोना आज भी याद है मुझे।

एक कुल्लड़ कॉफ़ी,
एक कलम हाथ में लिये,
सोच रहा हूँ ज़िन्दगी के कुछ लम्हो के बारे में।
एक रास्ता वो भी था जब काटे चुभते तो ज़रूर थे पर दर्द नहीं होता था।
एक मोड़ वो भी आया जब मुड़ने का अफ़सोस बहुत हुआ था।
एक रास्ते मे बिछे फूल भी मिले पर ज़हरीले थे कम्बख़त, पैरों में छाले अब तक नज़र आते हैं।

उन ज़हरीले फूलो की ख़ूबसूरती आज भी याद है मुझे।

एक कुल्लड़ कॉफ़ी,
एक कलम हाथ में लिये,
सोच रहा हूँ ज़िन्दगी के उन लम्हो के बारे में।
एक दिन वो भी आया जब रास्ते मे ना काटे थे और ना अंधेरा,
ना ज़हरीले वो फूल थे और ना कोई अंधा मोड़ था।
उन लम्हो का अफ़सोस अब मेरे मन मे नही था।

वो अंधेरे को चीर के आती पहली किरण आज भी याद है मुझे।

अब बस कुल्लड़ कॉफ़ी और कलम का साथ है,
ज़िन्दगी के उन्ही लम्हो को अब मैं ज़रा सा सोच लेता हूँ।
लिख लेता हूं चंद पंक्तियाँ, याद में,
क्योंकि उन्ही रास्तो और अंधेरी रातो ने तो सिखाया है मुझे
ग़लती उन रास्तो की या उन फ़ूलो की नहीं, वो मैं था जो नकार रहा था
अपनी ज़िन्दगी के लम्हो को।

हां वो लम्हे आज भी याद है मुझे।
हां वो लम्हे आज भी याद है मुझे…

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Abhilash Shrivastava
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